पहाड़ी दाले

पहाड़ी दाले

‘ (Pahadi Dals) का अर्थ उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों में उगाई और खाई जाने वाली पारंपरिक दालों से है पहाड़ी क्षेत्रों की भौगोलिक स्थिति और ठंडी जलवायु के कारण ये दालें मैदानी इलाकों की दालों से स्वाद, रंग और पौष्टिकता में काफी अलग और अधिक फायदेमंद होती हैं।

पहाड़ों में मुख्य रूप से निम्नलिखित दालें सबसे अधिक प्रसिद्ध हैं:

प्रमुख पहाड़ी दालों के नाम

  • गहत या कुलथ (Gahat / Horse Gram): यह दाल पहाड़ों में विशेष रूप से सर्दियों में खाई जाती है क्योंकि इसकी तासीर गर्म होती है। आयुर्वेद और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह किडनी की पथरी (Stone) को गलाने के लिए रामबाण मानी जाती है।
  • भट्ट की दाल (Bhatt ki Dal / Black Soybean): यह काले रंग की सोयाबीन होती है जो प्रोटीन और आयरन से भरपूर होती है। इससे उत्तराखंड का प्रसिद्ध व्यंजन ‘भट्ट की चुटकानी’ और 
    डुबके

     तैयार किए जाते हैं।

  • चैंसु / चौंसा (Chainsoo / Chaunsa): यह साबुत काली उड़द को भूनकर और पीसकर लोहे की कढ़ाई में बनाई जाने वाली गाढ़ी दाल है, जो सर्दियों में शरीर को ऊर्जा और गर्माहट देती है।
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  • नवरंगी दाल (Naurangi Dal): यह नौ अलग-अलग रंगों और स्वादों वाली दालों का एक पारंपरिक मिश्रण (Mix Dal) होती है, जो पोषक तत्वों का भंडार है।
  • रैस या पहाड़ी तोर (Rais / Pahadi Toor): यह पहाड़ों की अरहर/तूर दाल होती है, जिसका स्वाद बहुत ही सौंधा और बेहतरीन होता है।

पहाड़ी दालों की विशेषताएं

  • लोहे की कढ़ाई में पकाना: अधिकांश पहाड़ी दालों को पारंपरिक रूप से लोहे की कढ़ाई में धीमी आंच पर पकाया जाता है, जिससे दाल का रंग गाढ़ा (कालापन लिए हुए) हो जाता है और उसमें भरपूर मात्रा में आयरन मिल जाता है।
  • जखिया का तड़का: इन दालों में आम जीरे के बजाय पहाड़ी मसाले ‘जखिया’ (Wild Mustard) या लहसुन के पत्तों का तड़का लगाया जाता है, जो इसे एक अनोखी खुशबू और क्रंची स्वाद देता है।
  • स्वास्थ्य के लिए अमृत: ये दालें बिना किसी केमिकल और पॉलिश के पूरी तरह ऑर्गेनिक (जैविक) तरीके से उगाई जाती हैं, जिससे इनमें फाइबर और प्रोटीन की मात्रा बहुत अधिक होती है।

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