पहाड़ी जौ

Price range: ₹199.00 through ₹330.00

Description

पहाड़ी जौ (जिसे माउंटेन बार्ली या हिमालयन बार्ली भी कहा जाता है) एक पारंपरिक, बिना पॉलिश किया हुआ साबुत अनाज है, जिसकी खेती मुख्य रूप से उत्तराखंड हिमालय और हिमाचल प्रदेश के जैविक खेतों में की जाती है। मुख्य विशेषताएं: स्रोत: सोमेश्वर (अल्मोड़ा) जैसे क्षेत्रों में स्थानीय किसानों द्वारा पारंपरिक, रसायन-मुक्त तरीकों से उगाया जाता है। स्वरूप: पॉलिश किए गए व्यावसायिक जौ के विपरीत, पहाड़ी जौ अपने प्राकृतिक छिलके, अखरोटी स्वाद और आवश्यक पोषक तत्वों को बरकरार रखता है। प्राकृतिक प्रसंस्करण: इसे आमतौर पर धूप में सुखाया जाता है और हाथ से साफ किया जाता है, इसमें कोई औद्योगिक प्रसंस्करण या योजक नहीं मिलाया जाता है। पोषण और स्वास्थ्य लाभ: पहाड़ी जौ को इसके समृद्ध पोषण के कारण "सुपरफूड" माना जाता है। उच्च फाइबर सामग्री: घुलनशील और अघुलनशील दोनों प्रकार के फाइबर से भरपूर, जो पाचन में सहायता करता है, आंतों के स्वास्थ्य में सुधार करता है और कब्ज से बचाता है। वजन प्रबंधन: यह भूख को कम करने में मदद करता है और तृप्ति का एहसास कराता है, जिससे यह वजन घटाने में प्रभावी होता है। शीतलता गुण: आयुर्वेद में, इसे शीतलता देने वाला अनाज (यव) माना जाता है, जो इसे शरीर की आंतरिक गर्मी को संतुलित करने के लिए गर्मियों का एक आदर्श मुख्य आहार बनाता है। पित्त। जीर्ण रोगों से बचाव: इसमें फेरुलिक एसिड और लिग्नन्स जैसे एंटीऑक्सीडेंट होते हैं, जो हृदय रोग और कुछ प्रकार के कैंसर के जोखिम को कम कर सकते हैं। मधुमेह के अनुकूल: इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होता है, जिससे रक्त शर्करा का स्तर स्थिर रहता है। पारंपरिक उपयोग: पेय पदार्थ: जौ का पानी या जौ की राबड़ी जैसे पारंपरिक शीतल पेय बनाने में उपयोग किया जाता है। आटा और सत्तू: रोटियों के लिए जौ का आटा (मैदा) बनाने के लिए पीसा जाता है या गर्मियों के पौष्टिक नाश्ते के लिए सत्तू बनाने के लिए भुना जाता है। अनुष्ठान: उत्तराखंड के सांस्कृतिक अनुष्ठानों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जैसे पूजा और हवन में इसका उपयोग किया जाता है।

Additional information

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440 gram, 940 gram

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